अर्थक्रियाकारित्व

बौद्ध दर्शन अनुसार अर्थक्रियाकारित्व

किसी वस्तु की सत्ता का लक्षण है ‘अर्थक्रियाकारित्व’ अर्थात् किसी कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति अर्थात् कार्योत्पादन सामर्थ्य वर्तमान भूत से जन्य या उत्पन्न है अर्थात् भूत वर्तमान को उत्पन्न करने में शक्त या समर्थ है।बौद्धों ने सत्ता का यह लक्षण क्षणिकता की सिद्धि के लिए किया है।

• ज्ञान के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी विषय की सिद्धि नहीं होती। इसलिए ज्ञेय और ज्ञान में अभेद होता है। तुम्हारे (वेदान्ती) और मेरे (बौद्ध के) मत में द्रव्य के ज्ञान से अभिन्न अनुभव के विषयभूत घट में द्रव्य (घट आदि) का भेद प्रसिद्ध है क्या?

  • विज्ञानवादी बौद्धों के मत में वस्तु की बाह्यसत्ता नहीं होती। विज्ञप्ति या ज्ञानमात्र में ही उन्हें वस्तु की सत्ता स्वीकार्य है जबकि अद्वैत वेदान्त में ज्ञान और ज्ञेय काल्पनिक नहीं हैं। उन्हें वस्तु की बाह्य सत्ता भी स्वीकार्य है। ज्ञान के विषय घट आदि में ज्ञानातिरिक्त घटरूप द्रव्य का भेद दोनो को ही स्वीकार नहीं है। आशय यह कि ज्ञान में उस ज्ञान का विषयभूत घट ही भासित होता है तद्भिन्न घट उस ज्ञान का विषय नहीं बनता।
  • चाहे प्रत्यक्ष हो या अनुमान, दोनो ही प्रकार की प्रमा एक समान उत्पन्न और विनष्ट होती हैं। इस प्रकार प्रत्यक्ष और अनुमान दोनो ही अस्थिर हैं। तब प्रत्यक्ष या अनुमान जैसे क्षणिक ज्ञान में भासित होने वाली वस्तु स्थिर कैसे हो सकती है। इसलिए हम प्रत्येक पदार्थ को क्षणिक कहते हैं।
  • विज्ञानवादी बौद्ध विज्ञप्ति या ज्ञान में ही वस्तु की सत्ता मानते हैं। ज्ञान चाहे प्रत्यक्ष हो या अनुमान, सभी अस्थिर होते हैं। अत: उस ज्ञान से अभिन्न घट आदि वस्तु कैसे स्थिर हो सकती है?
  • यदि कहें कि देखते ही नष्ट हो जाने वाले जलधर पटल में सत्ता का व्यभिचार नहीं होता, उसका अस्तित्व होता ही है तो मेघपटल की भाँति। यह सत्ता समस्त प्रपंचों में उसी क्षण उत्पत्ति और विनाशरूप क्षणिकता का निर्बाध रूप से बोध कराती है। ऐसा यह क्षणिकवाद बौद्धसिद्धान्त का घोष है।
  • विज्ञानवादी बौद्धों के अनुसार समस्त सत्तावान् क्षणिक हैं। जिस प्रकार सत्तावान् जलधरपटल क्षणिक है उसी प्रकार अन्य सांसारिक सत्तावान् पदार्थ भी क्षणिक हैं। सत्तावादी जलधरपटल की सत्ता स्वीकार करते हैं किन्तु क्षणवादी बौद्ध दृष्टनष्टस्वरूप उसी मेघपटल के दृष्टान्त से क्षणिकता की सिद्धि करते हैं। सत् जलधरपटल की क्षणिकता संसार के समस्त पदार्थों की क्षणिकता का दृष्टान्त है।
  • बाजार में प्राप्त चाँदी आभूषण आदि की क्रिया में समर्थ है किन्तु शुक्ति में प्रतीत होने वाली रजत से आभूषण का निर्माण नहीं हो सकता। अत: बाजार में प्राप्त रजत की सत्ता सिद्ध है किन्तु शुक्ति में रजत की विपणिस्थ शुक्ति के समान सत्ता नहीं मानी जाती। इस प्रकार प्रयोजनभूत जो निर्माण क्रिया उसको उत्पन्न करने का सामथ्र्य जिसमें हो वही सत्ता है।
  • बौद्धों के मत में समस्त पदार्थ क्षणिक हैं, अत: उनके सम्प्रदाय में सत्ता का लक्षण ‘अर्थक्रियाकारिता’ माना गया है। ‘प्रयोजनभूता या क्रिया तत्कारित्वमेव सत्त्वम् यह अर्थक्रियाकारित्वरूप ‘सत् का लक्षण है। उनका मानना है कि सत्ता वह है जो किसी कार्य को उत्पन्न करे। शुक्ति में प्रतीत होने वाली रजत शशविषाण की तरह कोई कार्य उत्पन्न नहीं कर सकती, अत: वह असत् है। किन्तु वास्तविक रजत आभूषण आदि क्रिया में समर्थ होने से सत् है।
    बौद्धों ने सत्ता का यह लक्षण क्षणिकता की सिद्धि के लिए किया है। रजत में अर्थक्रियाकारिता है इसलिए वह आभूषण के रूप में परिणत हो जाएगी। इस तर्क के सहारे बौद्ध अपने क्षणिकवाद को पुष्ट करते हैं। उदाहरण के रूप में बीज का दृष्टान्त लेते हैं। मान लें कि बीज क्षणिक नहीं है, स्थायी है तो इसकी सत्ता होने के कारण क्षण-क्षण में यह नए नए कार्य उत्पन्न करता रहेगा। यदि बीज सभी क्षणों में समान ही रहे, अपरिवर्तित हो, तो सदा वह उसी प्रकार का कार्य उत्पन्न करेगा किन्तु वस्तुस्थिति इसके विपरीत है। घर में रखा बीज वह नहीं जो खेत में डाला गया है। दोनों के कार्य भिन्न भिन्न हैं। यदि यह तर्क किया जाय कि वस्तुत: बीज वही कार्य उत्पन्न नहीं करता किन्तु उसमें क्षमता है जो उचित उपादानों (जैसे- पृथ्वी, जल आदि) के संसर्ग से अभिव्यक्त हो जाती है। अत: बीज सदा वही है। यह तर्क असहाय है, क्योंकि ऐसी दशा में यह स्वीकार करते ही हैं कि पहले क्षण का बीज अंकुरण का कारण नहीं प्रत्युत विभिन्न उपादानों के संसर्ग से परिष्कृत बीज ही उसका कारण है। अत: बीज तो परिवर्तित हो गया। इसी प्रकार कोई भी वस्तु दो क्षण नहीं ठहरती। सभी वस्तुएँ क्षणिक हैं। इसकी सिद्धि के लिए सत्ता का एक विशिष्ट लक्षण (अर्थक्रियाकारित्व) करना पड़ता है।
  • यदि तुम गौतम और कणाद के वचनों में दृढ़ता पूर्वक विश्वास करते हो और द्रव्य, गुण तथा कर्म में ही सत्ता (जाति) स्वीकार करते हो, तब यह बताओ कि वह सत्ता समवाय और विशेष पदार्थों में है या नहीं। अगर समवाय में सत्ता स्वीकार करते हो तो तुम्हारा सिद्धान्तभंग होगा क्योंकि समवाय एक और नित्य है। एक वस्तु में सत्ता तुम्हें स्वीकार नहीं। यदि विशेष में सत्ता स्वीकार करते हो तो समवाय और विशेष दोनो ही विनष्ट हो जायेगे।
  • न्याय और वैशेषिक में सत्ता (सामान्य) केवल द्रव्य, गुण और कर्म में मानी गयी है। यह सत्ता नित्य और अनेकसमवेत होती है। द्रव्य आदि में अनेक समवेतत्व सिद्ध होता है। द्रव्य अदि में यह सत्ता समवाय सम्बन्ध से रहती है किन्तु समवाय में समवायत्व रूप सामान्य नहीं रहता। इसका कारण यह है कि एक तो समवाय एक है, अत: उसमें अनेकसमवेतत्व सिद्ध नहीं होगा। दूसरा समवायत्व अपने सम्बन्धी में रहेगा किस सम्बन्ध से। सामान्य तो अन्य पदार्थों में समवाय सम्बन्ध से ही रहता है। अत: नैयायिक आकाशत्व, समवायत्व, भूतत्व और मूर्तत्व आदि को सामान्य न मान कर उपाधि मानते हैं।
    विशेष सामान्य रहित होने के कारण ही ‘विशेष’ कहलाता है। यह नित्यद्रव्य परमाणु का धर्म है। परमाणु में सामान्य धर्म होता नहीं। इसी तथ्य को ऊपर कहा गया है कि अगर समवाय में समवायत्व रूप सामान्य मान लिया गया तो आपके सिद्धान्त की हानि होगी और विशेष में सामान्य मान लेने से समवाय और विशेष दोनो नहीं रहेगे। विशेष में सत्ता मानने से वहाँ समवाय की व्याप्ति स्वयं हो जायेगी क्योंकि सामान्य समवाय सम्बन्ध से ही रहेगा। इससे विशेष नष्ट हो जायेगा और विशेष के नष्ट होते ही समवाय स्वयं नष्ट हो जायेगा क्योंकि वह अयुतसिद्ध होता है। अत: इन्हें जातिबाधक कहा गया है-
  • अगर तुम विशेषों में सत्ता के सामानाधिकरण्य से सत्ता सिद्ध करते हो और यह मान लेते हो कि विशेष में सत्ता भले न हो किन्तु विशेष द्रव्यों में विशेष की सत्ता तो है ही, अत: विशेष और सत्ता का सामानाधिकरण्य उन परमाणु आदि विशेषों में बन ही जाता है। इस पर आपत्ति यह है कि घटाभाव स्थल में भी वैसा सामानाधिकरण्य प्राप्त होने लगेगा। अर्थात् घट में अभाव और सत्ता दोनो का सामानाधिकरण्य हो जाने से घटाभाव नहीं हो सकेगा। यदि कहो कि अभाव और सत्ता दोनो अलग अलग सम्बन्धों से वहाँ रहेगे तो घटाभावस्थल में अभाव के स्वरूप सम्बन्ध से रहने के कारण सत्ता उसका वारण कर देगी क्योंकि वह घट में समवाय सम्बन्ध से रहती है और अभाव स्वरूप सम्बन्ध से। वस्तुत: यहाँ तुम्हारा समवायाभाव उसे रोकने में समर्थ नहीं हो पायेगा क्योंकि समवाय स्वयं भी घट में स्वरूप सम्बन्ध से ही रहता है। अत: स्वरूपसम्बन्ध से युक्त घटनिष्ठ समवाय सम्बन्ध की सत्ता ही वहाँ नहीं बन सकेगी।
  • अगर तुम्हारे समवाय और विशेष सत्तारहित होकर ही काम करते हैं तो फिर गुण, कर्म और द्रव्य में सत्ता क्यों मानते हो। यदि यह कहो कि समवाय और विशेष सत्तारहित होकर कार्य करते हैं तथा गुण आदि तीनों सत्तावान् हो कर कार्य करते हैं तो इसमें विनिगमक क्या है? इनमें वैपरीत्य क्यों नहीं है। अर्थात् गुण, कर्म और द्रव्य में सत्ता का अभाव क्यों न माना जाय। इसी प्रकार समवाय तथा विशेष में सत्ता क्यों न मान ली जाय?
  • जो वस्तु चिरकाल से अतीत (भूत) है उसकी उत्पत्ति हो नहीं सकती। जिसके समस्त हेतु घटित ही नहीं हुए वह भावी वस्तु भी कैसे उत्पन्न हो सकती है। एक क्षण में ही फल को उत्पन्न करने की विलक्षणता रूप क्षणिकविषयसत्ता ही अर्थक्रियाकारिता कहलाती है। अर्थात् उसी सत्ता में कार्य को उत्पन्न करने का सामथ्र्य होता है।
  • मुझे कारण के रूप में क्षण ही अभिमत है। बिना दूसरे पदार्थ की सहकारिता के कोई भी पदार्थ फल उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होता। वह सहकृति (सहकारी कारण) भी अपनी सहकृति के लिए किसी दूसरे कारण की अपेक्षा करती है। इस प्रकार सहकारिकारणों की इस परम्परा से अनवस्था उत्पन्न हो जाती है।
  • सहकारी कारणों की अपेक्षा से बौद्धों ने नैयायिकों के कार्यकारण सिद्धान्त में अनेक दोष दिखाये हैं। बौद्धों के अनुसार क्षणिकपदार्थ ही अर्थक्रियाकारी है। वही सत् है। जलादि सहकारीकारणों के द्वारा अतिशय के उत्पन्न होने पर भी यदि बीज आदि यथावत् स्थित रहते हैं तब तो इन सहकारियों का होना व्यर्थ है। यदि इस अतिशय से बीज दूसरी अवस्था (अंकुररूप) में पहुँच जाता है तब तो यह स्वयं सिद्ध है कि बीज की पूर्वावस्था क्षणिक थी। अत: हमारा क्षणिकवाद ही फलित होता है। अक्षणिक को तो सहकारिकारणों की सहायता पाकर भी तद्रूप ही रहना चाहिए। तभी अक्षणिकता की सिद्धि हो सकती है। किन्तु ऐसा नहीं होता। अत: क्षणिकता ही सब का कारण है। सहकारिकारणों की अपेक्षा से अनवस्थादोष स्पष्ट है।
  • इस प्रकार महान् अनवस्था की इस दु:स्थिति को दूर करने के लिये बौद्ध वृद्धों ने अतिशय तथा कुर्वदू्रपता नाम से फल के जनन में समर्थ इस क्षण की कल्पना की है। इसे मान लेने पर सहकारियों से होने वाली अनवस्था का प्रसङ्ग नहीं आता।
  • नैयायिक फलोत्पत्ति में तीन कारण मानते हैं- समवायि, असमवायि तथा निमित्त। बौद्धों के मत में सब कुछ क्षणिक होने से वह क्षण ही सब का कारण है। बौद्धों ने इस क्षण को ‘अतिशय’ या ‘कुर्वद्रूपता’ कहा है। यहाँ अतिशय शब्द से फलजनन में क्षण का उपकार कहा गया है। कुर्वद्रूपता कार्यजनकता का अवच्छेदक कोई विशेष है। इसी के कारण बीज से अंकुर की उत्पत्ति होती है।
  • और भी, तुम्हें अभीष्ट जो सत्ता है वह सर्वव्यापिनी है या अपने विषयभूत द्रव्य, गुण और कर्ममात्र में रहती है। इस विषय की आलोचना करने पर प्रथम मत (सत्ता की सर्वव्यापकता) तो स्वयं निरस्त हो जाता है क्योंकि तुम्हारे मत में स्वयं वह सत्ता सर्वव्यापक नहीं है। तुम स्वयं ही समवाय और विशेष में सत्ता नहीं मानते। दूसरे विकल्प के अनुसार यदि उसे द्रव्य, गुण और कर्म में व्यापक मानें तो आत्माश्रय दोष उत्पन्न हो जाता है। सत्ता का सम्बन्ध होने पर द्रव्य, गुण और कर्मरूप विषय की सिद्धि होती है तथा द्रव्य, गुण और कर्मरूप विषय की सिद्धि होने पर उनसे सत्ता का सम्बन्ध होता है। इस प्रकार इस पक्ष में परस्परसापेक्षता रूप आत्माश्रय दोष है।
  • यदि कहो कि प्रलय काल में सत्ता नहीं रहती, तब तो इसे नित्य कहना ही व्यर्थ है। अगर यह नित्य है तो इसे तीनो कालों में रहना चाहिए। यदि कहो कि यह नित्य है तो प्रलय काल में इसको आश्रय कहाँ से मिलेगा क्योंकि प्रलय काल में तो द्रव्य आदि सत्ता के आश्रय नष्ट हो जाते हैं। सत्ता तो किसी न किसी का आश्रय लेकर ही रहती है। आश्रितत्व उसका स्वभाव है।
  • अन्यापोह (अतद्व्यावृत्ति) मात्र से उपपन्न होने वाली अनुगत (समानाकार) प्रतीति ऊपर कहे गये आत्माश्रयादि दोषों से खण्डित सत्ता का बोध नहीं कराती। अपोहमात्ररूप शून्य के ही समस्त विषयों का धर्म हो जाने से सब कुछ शून्य (अभावरूप) ही हो जाता है, यह हमारा सिद्धान्त है।
  • नैयायिक अनेक व्यक्तियों की समानाकारप्रतीति में सत्ता, सामान्य या जाति को कारण मानते हैं। उन्हें अभिमत यह सत्ता (नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वम्) नित्य तथा अनेक घटव्यक्तियों में समवेत होती है। इसका अभिधान त्व या तल् प्रत्ययों से होता है। जैसे घटत्व। घटत्व सत्ता अनेक घटव्यक्तियों में समवेत होती है। उसी के कारण अनेक घट व्यक्तियों में ‘घटोऽयम्, घटोऽयम्’ इस प्रकार की अनुगत प्रतीति होती है।
    क्षणभंगवादी बौद्धों के मत में ऐसे किसी सामान्य या सत्ता की व्यवस्था नहीं बनती। सत्ता के स्थान पर अनुगत प्रतीति के कारण के रूप में उन्हें ‘अपोह अभिमत है। ‘अपोह उनका पारिभाषिक शब्द है। उसका अर्थ ‘अतद्व्यावृत्ति या ‘तद्भिन्नभिन्नत्व है। घट व्यक्तियों में ‘अघटव्यावृत्ति या घटभिन्न समस्त जगत् की व्यावृत्ति होने से उसमें तद्भिन्नभिन्नत्व, तत्- घट से भिन्न जो पट आदि सम्पूर्ण जगत् उससे भिन्नता उस घट में रहती है। इस प्रकार घटव्यक्तियों में अनुगत प्रतीति हो जाती है। बौद्ध उसके लिए सत्ता जैसे नित्यपदार्थ की संकल्पना नहीं करते।
    ऊपर अनेक पद्यों में सत्ता के दोष दिखाये गये हैं। विज्ञानवादी बौद्धों का मानना है कि अन्यापोह से अनुगत प्रतीति हो जाने के कारण उसके लिए आत्माश्रय आदि दोषों से दूषित सत्ता का मानना आवश्यक नहीं है। अतद्व्यावृत्ति से घटव्यक्ति में समस्त जगत् का अभावरूप शून्य प्राप्त हो जाता है। यह अपोहमात्र रूप शून्य ही समस्त विषयों का धर्म है। सत्ता किसी विषय का धर्म नहीं हो सकती। जब शून्य सभी पदार्थों का धर्म है तब सभी पदार्थ शून्य (अभाव) रूप ही सिद्ध हो जाते हैं। अत: नित्यसत्ता का कोई प्रसंग नहीं है। इस शून्य से ही अनुगत प्रतीति हो जाती है।
  • अनुभवपथ में आयी हुई समस्त वित्ति (ज्ञान) क्षणिक है। अत: वह अपने से अभिन्न वेद्य (घट आदि) में भी क्षणिकता का बोध करा देती है। वस्तु की सत्ता ज्ञान में ही होती है। नील और नील ज्ञान में अभेद होता है। क्षणिक नीलज्ञान में भासित होने वाले नील का बोध वह नीलज्ञान करा देता है। इस प्रकार परमार्थतत्त्व को जानने वाले को विद्यमान सुख को भी दु:ख ही मानना चाहिए। विनष्ट होने वाला सुख दु:ख को ही उत्पन्न करता है। जिस प्रकार ज्ञान की क्षणिकता से वस्तु की क्षणिकता निर्धारित हो जाती है उसी प्रकार सुख की विद्यमानता से दु:ख का निर्धारण हो जाता है।
  • सुख और उससे भिन्न धारावाही अनित्य क्षणों के ओघ के अनुभव से मुझमें विरक्ति उत्पन्न हो गयी है। संसार में चाहे सुख हो या उससे भिन्न कोई अन्य वस्तु, मेरी दृष्टि में वह सब अनित्य है। अत: इस अनित्यता से सांसारिक वस्तुओं पर मेरी कोई आसक्ति नहीं रही।
  • आस्तिक और नास्तिक सभी दर्शनप्रस्थानों में संसार की दु:खमयता सर्वसम्मत है। इसी से लोग दु:खनिवृत्ति में प्रवृत्त होते हैं। अत: बौद्ध ‘सर्वं दु:खं दु:खम की भावना करते हैं। इस पर यह प्रश्न हो सकता है कि संसार की यह दु:खमयता किसी के समान तो होगी। अत: कोई उदाहरण दिया जाना चाहिए कि सांसारिक दु:ख किसके समान है। इस विप्रतिपत्ति के निराकरण के लिए बौद्ध विद्वान् सलक्षण की कल्पना करने हैं। उनके मत में समस्त वस्तुएं क्षणिक हैं। प्रत्येक क्षण दूसरे क्षण से विलक्षण है, अत: कोई किसी के समान नहीं। किसी भी असाधारण लक्षण के अभाव में यह नहीं कहा जा सकता कि कौन किसके समान है। सबका अपना अपना लक्षण है। अत: सबमें ‘स्वं लक्षणं स्वं लक्षणम् की भावना करनी चाहिए।
    ऊपर पक्ष और सपक्ष के दृष्टान्त से इसी तथ्य को स्पष्ट किया गया है। एक पक्ष में कि जिस दु:खता का कथन किया गया कि अमुक दु:खता इस पक्ष में है तो सपक्ष में उसका सादृश्य नहीं दिखाया जा सकता। नैयायिक ‘पर्वतो वह्निमान् धूमात् यथा महानसम् कह कर पर्वतरूप पक्षगत धूम का सादृश्य महानस रूप सपक्ष गत धूम से दिखा देते हैं क्योंकि उनके यहाँ सत्ता है। बौद्धों के यहाँ सब कुछ क्षणिक है, अत: दृष्टान्त देकर इस दु:खता को समझाया नहीं जा सकता। उनके यहाँ सबका अपना अपना लक्षण है। अत: उनके यहाँ स्वलक्षणं स्वं लक्षणं की भावना की जाती है। उनकी प्रथम भावना ‘सर्वं दु:खं दु:खम्Ó तथा दूसरी ‘स्वं लक्षणं स्वं लक्षणम् है। वस्तुओं के स्वलक्षण होने के कारण उनके यहाँ सादृश्य का अभाव प्रसिद्ध है।
    स्वलक्षण की उनकी यह संकल्पना विभिन्न ग्रन्थों में चर्चित है।
  • इस प्रकार क्षणगतविलक्षणता की सिद्धि हो जाने से चार प्रकार से स्वलक्षण की भावना होती है- क्षणिक, शून्य, दु:ख और सादृश्यरहित असाधारण। सब कुछ क्षणिक है, क्षणिक है, सब शून्य है, शून्य है, सब दु:ख है, दु:ख है और सब कुछ विसदृश अर्थात् परस्पर असाधारण है, इन चार रूपों में स्वलक्षण की भावना होती है। तदनन्तर निर्विषयज्ञानरूप उपप्लव से विशुद्ध शून्यविज्ञानधारा, विषयज्ञान से रहित विज्ञान का सातत्य निर्वाण उत्पन्न होता है।
  • इस प्रकार भगवान् बुद्ध के द्वारा अपने उपदेश का शासन (कथन) करने पर अपनी बुद्धि के वैविध्य से उनके शिष्यों ने उनकी सूक्ष्म उक्तियों का आशय चार प्रकार से ग्रहण किया। उस उपदेश के ग्रहणभेद से भिन्न होकर भी उनके चारो प्रकार के शिष्य उनके द्वारा कहे गये सिद्धान्तों के निष्कर्ष पर कोई विवाद नहीं करते।
  • परमपुरुषार्थ या निर्वाण के विषय में बौद्धों की चार प्रकार की भावनाएं या दृष्टिकोण हैं। ये बौद्ध माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक और वैभाषिक नाम से प्रसिद्ध हैं। इनमें माध्यमिकों के मत में सब कुछ शून्य है, योगाचार बाह्यपदार्थों को शून्य मानते हैं, सौत्रान्तिक बाह्यपदार्थों को अनुमानगम्य मानते हैं तथा वैभाषिक बाह्यपदार्थों को प्रत्यक्ष से ज्ञेय मानते हैं। इन सबके उपदेष्टा यद्यपि भगवान् बुद्ध हैं तथापि इन्होंने अपनी अपनी बुद्धि से उनके उपदेशों को कुछ अन्तर के साथ समझा। अत: उनके शिष्यों के उपर्युक्त चार भेद प्रसिद्ध हैं। जिस प्रकार (गतोऽस्तमर्क:) (सूर्य डूब गया) कहने पर जार, चोर, वेदपाठी आदि अपनी अपनी इच्छा के अनुसार अभिसरण, परधन का हरण, और सदाचरण आदि का समय समझ लेते हैं उसी प्रकार बुद्धि भेद से इन शिष्यों ने भी बुद्ध के उपदेशों को समझा। बौद्धों की चार भावनाएं हैं-
    १. सब कुछ क्षणिक है, क्षणिक है, २. सब कुछ दु:ख है, दु:ख है, ३. सभी का लक्षण अपने आप में है तथा ४. सब कुछ शून्य है, शून्य है।
    ऊपर श्लोक में इसी तथ्य का प्रतिपादन हुआ है।
  • ज्ञानभित्ति होने पर उसमें ज्ञेयपदार्थ की सविषयता का मालिन्य होगा ही। वह मालिन्य कभी भी कैसे भी दुर्निवार होता है। उसे हटाया नहीं जा सकता। इसलिए बुद्धिमान् मुमुक्षुओं को शून्य के साम्राज्यसिद्धि की अभिलाषा अवश्य करनी चाहिए। सब कुछ शून्य है, शून्य है, इस भावना से सबका निषेध हो जाता है।
  • माध्यमिक जगत् में शून्य की भावना रखते हैं। उनका कथन है कि कोई भी ज्ञान सविषयक होनेे से मलिन होता है। अत: शून्यवादी माध्यमिक ज्ञान का निषेध करते हैं। उनका कथन है कि शुक्ति में रजत का भ्रम हो जाने पर उस शुक्ति के पास जाता है और रजत को नहीं देख पा। उससे इस निषेध की सिद्धि हो जाती है कि मैंने स्वप्र में या जागृत अवस्था में रजत नहीं देखी (स्वप्रे जागरणे च न मया दृष्टं रजतादीति) इस ज्ञान में (निषेध) नुञ् का अन्वय कारक सम्बद्ध क्रिया से है। अत: यहाँ दर्शन क्रिया का, उसके कर्ता का तथा उसके कर्म का, इन तीनों का ही निषेध प्राप्त होता है। प्रकारान्तर से इसे ही धर्मी, धर्म और उनके सम्बन्ध का निषेध कहते हैं।
  • आकाशपुष्प के समान कहीं न प्राप्त होने वाली आकार शून्य वित्ति (ज्ञान) यदि सुषुप्ति में होगी तो भी शून्यरूप ही होगी। इसलिए माध्यमिकों की कथनशैली इस शून्यरूपता को ही भगवान् बुद्ध को अभिमत निर्वाणरूप परमतत्त्व के रूप में प्रकट करती है।
  • निराकार निर्विषय ज्ञान का होना अति कठिन है। अत: उसे यहाँ गगनकुसुमकल्प कहा गया है। सुषुप्ति में भी यह वित्ति शून्यरूप ही होती है। माध्यमिकों के अनुसार यह शून्य ही बुद्धवचनों का परमतत्त्व है। जिसमें सबका निषेध हो जाता है। उनका यह शून्य सत्, असत्, उभयात्मक और अनुभयात्मक कोटियों से सर्वथा भिन्न है। अर्थात् यह शून्य न तो सत् है, न असत्, न सदसत् और न ही सदसत् से भिन्न। यह शून्य वेदान्तियों के अद्वैततत्त्व की तरह अनिर्वचनीय है। माध्यमिकों के अनुसार यही बुद्धाभिमत निर्वाण है।
  • संसार में सब कुछ शून्य मान लेने से संसार की अन्धता प्रसक्त होती है। इसलिए इस शून्यत्ववाद में स्वप्रकाश बुद्धि को स्वीकार करना चाहिए। विभ्रम आदि स्थलों में वह बुद्धि विविध रूपों में प्रकाशित होती है। इस बुद्धि से व्यवहार किया जाना चाहिए। अर्थात् इस बुद्धि से ही बाह्यवस्तुओं की शून्यता का ज्ञान मानना चाहिए। बाह्य वस्तु शून्य रहे, वह हमें भी स्वीकार्य है।
  • ऊपर दो पद्यों में माध्यमिकों का सिद्धान्त प्रस्तुत किया गया था। अब दो श्लोकों में योगाचार या विज्ञानवादी का मत प्रस्तुत कर रहे हैं। विज्ञानवादी माध्यमिकों की तरह सर्वशून्यत्ववाद स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है कि सर्वशून्यत्ववाद मानने से समस्त संसार अंधा हो जायेगा। इसलिए बाह्यपदार्थों की शून्यता तो माननी चाहिए किन्तु चित्तादि आन्तरपदार्थों को सत्य मानना ही पड़ेगा। अन्यथा उस शून्य का ज्ञान कैसे होगा। संसार की शून्यता जिस बुद्धि, मन, चित्त या विज्ञान से प्रतीत होती है, उन आन्तर पदार्थों को सत्य मानना आवश्यक है। अन्यथा शून्य का ज्ञाता कौन रहेगा? बाह्यार्थ की शून्यता इन्हें भी स्वीकार है। आगे योगाचार की दृष्टि से विमुक्ति का प्रतिपादन करते हैं।
  • सुषुप्ति में बुद्धि की ज्ञानधारा (आलय विज्ञान) उत्पन्न होती है। वही आलय विज्ञान जागृत अवस्था एवं स्वप्नावस्था से सम्बद्ध ‘मैं हूँ इस प्रकार की वित्तियों को जन्म देता है। इस सर्जना मे अनादि वासना ही नियत कारण है। योगाचार की दृष्टि में इस वासना के विनाश से ही मुक्ति का उदय होता है।
  • विज्ञानवादी बौद्ध अवस्थाभेद से विज्ञान के दो भेद करते हैं। उनमें से आलयविज्ञान धर्मों के बीजों का स्थान है। समस्त धर्म बीजरूप में आलयविज्ञान में अवस्थित रहते हैं। यही बाहर निकल कर जगत् के व्यवहार का निर्वाह करते हैं।
  • विषय का परित्याग कर देने से ज्ञान में भेद की सिद्धि नहीं होती। अनुभव के बिना विचित्र वासना नहीं हो सकती। सौत्रान्तिक विद्यमान बाह्यवस्तु को अनुभवगत नाना आकारों से नित्य अनुमेय मानते हैं।
  • योगाचारों के मत में बाह्य अर्थ शून्य है किन्तु सौत्रान्तिक इस सिद्धान्त को स्वीकार नहीं करते। उनके मत में बाह्य वस्तु है किन्तु वह अनुमेय है। उसका प्रत्यक्ष नहीं होता। सभी पदार्थों के क्षणिक होने से ज्ञान भी क्षणिक ही है। प्रथमक्षण में विषय का इन्द्रिय से सन्निकर्ष होता है, इससे ज्ञान की उत्पत्ति होती है। उस ज्ञान में प्रथमक्षण में अनुभूत वह विषय अपने आकार का समर्पण कर देता है। द्वितीयक्षण में उसी समर्पित विषय का अनुमान होता है। आशय यह है कि घटादि विषय क्षणिक हैं। अत: एक क्षण में नष्ट होकर वह अपने अर्थक्रियाकारित्व के बल से दूसरे क्षण में अपने आकार के सदृश दूसरे घट को उत्पन्न करता है। पूर्वक्षण में अनुभूत वह घट ही इन्द्रिय के साथ मिल कर द्वितीय क्षण में अपने सदृश घट ज्ञान को भी उत्पन्न करता है। इसी घटज्ञान से पूर्वक्षणानुभूत घट का अनुमान होता है। इसी तथ्य को कवि ने ‘अनुभव, वासना और अनुभवगतनानाकारÓ शब्दों से कहा है। सौत्रान्तिकों के इस सिद्धान्त को एक छन्द में बाँधने हेतु कवि ने इसे अति संक्षेप में कहा है, अत: उसका कठिन हो जाना स्वाभाविक ही है।
  • किसी भी वस्तु को प्रत्यक्ष न मान कर अनुमिति कैसे हो सकती है। वह अनुमिति तो पहले दोनो (वह्नि और धूम) के सम्बन्ध को (महानस आदि में) प्रत्यक्ष देखने से होती है। ‘मैं विषय का अनुभव कर रहा हूँ इस ज्ञान में सभी एक मत हैं। इसलिए वैभाषिक क्षणिक भी वस्तु को प्रत्यक्ष मानते हैं।
  • वैभाषिक सौत्रान्तिकों के ‘सर्ववस्तु अनुमेयवाद का खण्डन करते हैं। वैभाषिकों का मानना है कि अनुमिति साहचर्य ज्ञान के बिना नहीं हो सकती। कोई भी महानस आदि में पहले धूम और अग्रि के सम्बन्ध को प्रत्यक्ष देखता है और व्याप्ति ज्ञान प्राप्त करता है तभी उसे धूम को देखकर वह्नि का ज्ञान होता है। अगर सब कुछ अनुमेय ही मान लिया जायेगा, कुछ भी प्रत्यक्ष नहीं रहेगा तो व्याप्तिज्ञान के अभाव में वह अनुमान होगा कैसे? अत: ‘अहं विषयमनुभवामि जैसे ज्ञान के बल पर वैभाषिक क्षणिक वस्तु की भी प्रत्यक्षसत्ता मानते हैं। उनका यह प्रत्यक्ष निर्विकल्पक है।
  • इस प्रकार परस्पर मतभेद होने पर भी नित्य आत्मा के विरोध में सभी बौद्ध सम्प्रदाय एक जुट हैं और यह कहते हैं कि ‘जन्मों के समूह से उत्पन्न दु:ख से नित्य आत्मा का आश्रय लेकर यह भीरुता व्यर्थ है। इस भीरुता का अस्त्र तो ‘सर्वं क्षणिकं क्षणिकम् इत्यादि भावना चतुष्टय है। इस भावना से ही इस भीरुता का विनाश हो जाता है, अत: नित्य आत्मा को स्वीकार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
  • काल चक्र के भ्रमण से सुख और दु:ख स्वभाव से ही प्राप्त होते हैं। वे पूर्वकर्म के फल नहीं हंै। इस कालचक्र के भ्रमण से प्राप्त होने वाली दु:खता ही यहाँ विचारणीय है। इसी से सुख और दु:ख की उपेक्षा होती है। निश्चय ही सुख और दु:ख के क्षणिक होने से प्राप्त होने वाले नये सुख और दु:ख रूप राग और द्वेष, प्रेम और क्रोध के स्थान नहीं होते। क्षणिक होने से न तो सुख के प्रति हमारा अनुराग होता और न ही दु:ख से द्वेष ही होता।
  • आत्मा के नित्यत्व पक्ष में ‘यह सुख है इस ज्ञान में राग अनिवार्य है। सुखप्रद वस्तु के प्रति राग होना स्वाभाविक है। हम क्षणिकवादियों के मत में दु:ख पुन: पुन: अनुवृत्त होता है। बार बार आया हुआ नवीन दु:ख द्वेष का जनक नहीं होता। जन्म से अन्धा व्यक्ति तथा शत्रुरोग से नष्ट किये गये नेत्रों वाला व्यक्ति स्वलक्षणता के कारण समान दु:ख का अनुभव नहीं करते। इसी प्रकार वन्ध्या तथा मृतपुत्रा स्त्रियाँ भी अपने दु:ख को समान नहीं मानतीं। अथवा जन्मान्ध और वन्ध्या क्रमश: शत्रुरोग से नष्ट किये गये नेत्रों वाले व्यक्ति के समान तथा नष्टपुत्रा स्त्री के समान दु:ख का अनुभव नहीं करते। सभी पृथक् पृथक् दु:ख का अनुभव करते हैं। इस प्रकार दु:ख की क्षणिकता सिद्ध है।
  • इस प्रकार मेरे द्वारा कहे गये मार्ग से अनित्यता (क्षणिकता) की सिद्धि हो जाती है। अत: हे भ्रमर! तुम भी ‘नित्य आत्मा अपने द्वारा किये गये पाप और पुण्य द्वारा उत्पादित सुख और दु:ख का अनुभव करता है इस आग्रह को छोड़ो। अलंघ्य सुख और दु:ख को समान समझो। इनमें से कोई भी नित्य नहीं है। दोनों ही क्षणिक हैं।
  • क्षणिक होने के कारण पदार्थों में सदैव हमारी उपेक्षा बुद्धि ही रहती है। हम ‘सर्वं शून्यं शून्यम् इत्यादि चारों भावनाओं से समस्त पदार्थों को समान (क्षणिक) ही मानते हैं और उस क्षणिक सुख दु:ख का भोग करते हैं। उसी से कृतकृत्य होकर हम भिक्षा आदि से प्राप्त सुखजनक पदार्थों से बारहों इन्द्रियों (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय तथा बुद्धि और मन) को तृप्त करते हैं।
  • पूजे गये परोक्ष देवताओं से कोई फल नहीं मिलता। अपने इन्द्रियों की पूजा अत्यधिक सुख देती है। आत्मा भी इन्द्रियों के अधीन है, अत: इन्द्रिय भी चैतन्य हैं। इसलिए अनेक उपायों से इन इन्द्रियों की पूजा करनी चाहिए। देवताओं की पूजा का कोई औचित्य नहीं है।
  • ( यह चर्चा एक ग्रंथ से ली गई है, इस ग्रंथ में आचार्य ने बौद्ध के क्षणभंगवाद का खंडन करने से पहले बौद्धों के सिद्धांत का विस्तृत वर्णन किया है।http://www.sanskrit.nic.in/ASSP/Alivilas/6frame3.htm?fbclid=IwAR3Y2HbBpCPP5Ah_vOG_vMaeVuuk07u6tYcrwET4xJUozO2W8UDwPYtqYhE )
    Audios by Preeti jain
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    https://drive.google.com/file/d/1DtikaewPwCw8hdoYMbtKSxo-z_kmfid4/view?usp=drivesdk
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    https://drive.google.com/file/d/1Dd5yV7XGnLjiB7QdKGq9iDERBmpECHuC/view?usp=drivesdk
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    https://drive.google.com/file/d/1DZ-MaOrSBpysktfyVusELZSLhbCOxXHr/view?usp=drivesdk
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    https://drive.google.com/file/d/1Dh9TH03kDxL4isb1pGq8WnsStO0dVVP0/view?usp=drivesdk

धर्मकीर्ति विरचित न्याय बिन्दु

Text of Indian Philosophy, B.A. (Hons) Philosophy, 4th semester, Delhi University

न्यायबिन्दु के विषय सम्यक् प्रमाण का महत्व, उसके लक्षणों का विवेचन। Audio- Preeti Jain

https://drive.google.com/file/d/1QbRHgsGVACcR3FZ5q6VBjW84WM6yhT18/view?usp=drivesdk

धर्मकीर्ति विरचित न्यायबिन्दु

B.A. (Hons) Philosophy, 4th semester, DU
प्रमा, प्रमाण, प्रमेय, प्रमाता, सम्यक् ज्ञान की हिन्दी में व्याख्या- प्रीति जैन

https://drive.google.com/file/d/1QNGqSUaAgsbhhRN45HiM4Qfj5ZQbN3ni/view?usp=drivesdk