Existentialism Is Humanism (अस्तित्ववाद मानववाद है) -ज्यां पाल सार्त्र

दिल्ली विश्वविद्यालय के B.A. (Hons) 2nd Yr, में एक पेपर Text of Western Philosophy’ निर्धारित है।जिसके स्लेबस का पहला टॉपिक सार्त्र की यह पुस्तक है।
1946 में सार्त्र ने एक भाषण दिया जो एक किताब Existentialism Is Humanism (अस्तित्ववाद मानववाद है) के रुप में सामने आया ।  इसमें उन्होंने इस बात को सामने रखा कि अस्तित्त्ववाद मानवता विरोधी नहीं है ।
*ज्यां  पाल सार्त्र की धारणा ‘अस्तित्व सार का पूर्ववर्ती है‘ अस्तित्ववादी दर्शन की व्याख्या करने वाली आधारभूत धारणा है। सार्त्र अपने प्रसिद्ध व्याख्यान ‘अस्तित्ववाद मानववाद है’ (1946) में कहते हैं कि प्लेटो एवं अरस्तू से लेकर हीगेल तक मुख्यधारा के दार्शनिक मानते रहे हैं कि सृष्टि के भीतर मौजूद परम ज्ञान, जिसे वे ‘आयडिया’ कहते हैं, सृष्टि की रचना का मूल कारण है। यानी सृष्टि का अस्तित्व बाद में आता है, पहले सृष्टिकर्ता के भीतर उसका तत्वज्ञान रहता है। ये दार्शनिक तत्वज्ञान या परमअर्थ को पहले और अस्तित्व को बाद में प्रकट होने वाली वस्तु मानते हैं, जबकि अस्तित्ववादी इस ज्ञान क्रम को उलट देते हैं। वे कहते हैं कि जगत का अस्तित्व, मनुष्य के संदर्भ में पहला है; फिर इस अस्तित्व का ज्ञान हमारी चेतना का रूप लेता है। यानी हम ‘होते’ पहले हैं, फिर ‘अपने’ होने के असल अर्थ को पाते हैं। 
यहां ‘होने’ के अर्थ को समझना जरूरी है। ‘होना’ दो तरह का होता है — एक ‘अस्तित्व में होना’ है। दूसरा, ‘होते हुए होना’ है।
एक हम उसी तरह होते हैं, जैसे शेष सारे पदार्थ हैं और एक हम अपने होने के ‘बोध’ के साथ इस ‘होने के अर्थ’ को खोजते और पाते हुए होते हैं। अस्तित्ववाद में मनुष्य यही सफर तय करता है। *(http://hindisahityakosh-bbp.blogspot.com/2015/01/normal-0-false-false-false-en-in-x-none_37.html?m=1)
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