टॉपिक- परिभाषा (Definitions)B.A. (Hons) philosophy, 3rd semester, B.A.(prog.) 6th semester, SEC- Critical Thinking


आपने ऐसे वाक्य कई बार सुने होंगे-
#”मेरे कहने का अर्थ ये नहीं था।”#”आपने मेरी बातों को अन्य अर्थ में लिया।”#”मेरी बात को तरोड़- मरोड़ कर पेश किया।”#”उसने अपनी बात कहने में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया, जिससे सुनने वाला अपने अनुसार अर्थ निकाल सकता है।”#”एक ही शब्द के कई मायने हो सकते है,ये तो इस पर निर्भर करता है कि कहने वाले का उद्देश्य क्या था और उसने किस सन्दर्भ में वह बात कही।”
ये सब वाक्य भाषा के लचीलेपन को दर्शाते हैं। अगर हम अपने विचार तर्कपूर्ण तरीके से रखना चाहते हैं, तो हमें भाषा के लचीलेपन की वजह से उत्पन्न अलग -अलग कारणों और दोषों की जानकारी होना जरुरी है। संयमित और स्पष्ट भाषा ना सिर्फ कही गयी बात को ओर अधिक प्रभावशाली बना देती है, वरन हमारे चिंंतन-मनन की प्रक्रिया को भी सरल और स्पष्ट बना देती है। शब्दों को परिभाषित कर देना एक स्पष्टता प्रदान करता है।
 आलोचनात्मक चिंतन स्पष्टता व निश्चितता के निर्धारण पर ध्यान देते हैं।यह तभी सम्भव है, जब किये गये दावों में सही शब्दों का प्रयोग होगा। यह स्पष्टता इस बात पर निर्भर करती है कि शब्द किस रुप में परिभाषित किया गया है।जैसे-भूर्ण हत्या, गर्भपात, पशु-पक्षी अधिकार  पर चर्चा आसान हो सकती है,अगर यह स्पष्ट रुप से परिभाषित हो कि ‘व्यक्ति’ (person) किसे माना जाये।अगर ‘व्यक्ति ‘की परिभाषा में अजन्मे बच्चे ,पशुओं,पौधों को भी शामिल कर दिया जाता है तो स्पष्ट रुप से इनके भी वही अधिकार होंगे जो किसी पूर्ण विकसित मानव के एक व्यक्ति होने की वजह से होते हैं। नीचे साझा किये गये दो पृष्ठों में परिभाषाओं के उद्देश्य व उनके अलग -अलग प्रकार को संक्षिप्त में बताया गया है।

Cognitive Biases ( संज्ञात्मक पूर्वाग्रह)

B.A.(H) Philosophy, 3rd semester, B.A(P) phil Discipline,  6th semester SEC- Critical Thinking, Delhi University

Topic : Cognitive Biases ( संज्ञात्मक पूर्वाग्रह)

स्थिति 1

अगर हमें  या हमारे समूह के किसी व्यक्ति को सफ़लता मिलती है,तो हम इसे कठिन परिश्रम का परिणाम मानते हैं ।वहीं अगर किसी दूसरे व्यक्ति या अन्य समूह से सम्बंधित व्यक्ति को सफ़लता मिलती है तो हम इसे मेहनत का नाम ना देकर उनके सौभाग्य का परिणाम मानते हैं ।वहीं अपनी असफलता का दोष भाग्य पर डाल देते है और दूसरे की असफलता का कारण उसके आलस और परिश्रम ना करना मानते हैं।

स्थिति 2

आप कहीं खड़े हैं, तभी एक व्यक्ति वहाँ आता है और ऊँची आवाज में सभी व्यक्तियों को जमीन पर लेट जाने के लिये कहता है।वह यही बात जोर-जोर से कई बार दोहराता है।अधिकतर लोग और शायद आप भी उसकी बात मानकर जमीन पर लेट जायेंगें ।

स्थिति 3

आपकी कक्षा में कोई प्रश्न पुछा गया। आपका उत्तर À है और कक्षा के अन्य सभी छात्रों का उत्तर B है।आपका मन हो ना हो संदेह की स्थिति में जरूर आ जायेगा कि आपका उत्तर गलत है।   यह भी हो सकता है कि आप उसी विकल्प का चुनाव कर लें जो बाकियों ने चुना है, क्योंकि odd one out कि स्थिति में कौन पड़ना चाहता है!


क्या आपको तीनों स्थितियों में व्यक्ति का निर्णय पूरी तरह उसके नियन्त्रण में नज़र आता है? या आप मानेंगे की हमारा मस्तिष्क एक विशेष प्रकार से काम करने को बाधित नज़र आता है?


धारणाओं को बनाने में जितना तथ्यों का हाथ होता है उतना ही व्यक्ति की मनोस्थिति व संवेदनाओं का भी रहता है।मनुष्य का मस्तिष्क प्रति सेकंड 160क्रियाओं को पूरा कर सकता है,जो इसे किसी भी कम्प्युटर या मशीन से बेहतर बनाता है।लेकिन इस मस्तिष्क में कई कमियां हैं।इन्हीं में से एक है -संज्ञात्मक पूर्वाग्रह या अंग्रेजी में जिसे कहते हैं cognitive bias। ये एक तरह का दिमागी पक्षपात है ,जो हमें चेतना और सूझ- बूझ  से परे कर देता है और हम सिर्फ अपनी धारणाओं के आधार पर फ़ैसला लेते हैं। शेयर किये गये तीन पेजों में ऐसे 11संज्ञात्मक पूर्वाग्रहों को इंगित किया गया है।

लोकाचार, मनोभाव, तार्किक विचार(Ethos, Pathos, Logos)

यह टॉपिक दि•वि • के B.A. पाठयक्रम का हिस्सा है। कौशल वर्धन पाठ्यक्रम (Skill enhancement paper) विद्यार्थी को अपने विषय का व्यवहारिक जीवन में प्रयोग कर जीवन को बेहतर तरीके से जीने के लिए तैयार करता है । दर्शन शास्त्र विषय में निर्देशित पाठ्यक्रम “आलोचनात्मक विचार और निर्णयात्मकता “(critical thinking and decision making) विद्यार्थी की तर्क शक्ति प्रयोग करने की समझ को बढ़ाकर और संवेदनाओं व अन्य सूझबूझ को प्रभावित करने वाले कारकों से रहित हो निर्णय लेने की क्षमता को विकसित करता है। यह टॉपिक श्रोता को अपनी बात से सहमत कराने के लिये वक्ता द्वारा अपनाये जानेवाले तीन प्रोत्साहन के तरीकों की बात करता है।