आपने ऐसे वाक्य कई बार सुने होंगे-
#”मेरे कहने का अर्थ ये नहीं था।”#”आपने मेरी बातों को अन्य अर्थ में लिया।”#”मेरी बात को तरोड़- मरोड़ कर पेश किया।”#”उसने अपनी बात कहने में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया, जिससे सुनने वाला अपने अनुसार अर्थ निकाल सकता है।”#”एक ही शब्द के कई मायने हो सकते है,ये तो इस पर निर्भर करता है कि कहने वाले का उद्देश्य क्या था और उसने किस सन्दर्भ में वह बात कही।”
ये सब वाक्य भाषा के लचीलेपन को दर्शाते हैं। अगर हम अपने विचार तर्कपूर्ण तरीके से रखना चाहते हैं, तो हमें भाषा के लचीलेपन की वजह से उत्पन्न अलग -अलग कारणों और दोषों की जानकारी होना जरुरी है। संयमित और स्पष्ट भाषा ना सिर्फ कही गयी बात को ओर अधिक प्रभावशाली बना देती है, वरन हमारे चिंंतन-मनन की प्रक्रिया को भी सरल और स्पष्ट बना देती है। शब्दों को परिभाषित कर देना एक स्पष्टता प्रदान करता है।
आलोचनात्मक चिंतन स्पष्टता व निश्चितता के निर्धारण पर ध्यान देते हैं।यह तभी सम्भव है, जब किये गये दावों में सही शब्दों का प्रयोग होगा। यह स्पष्टता इस बात पर निर्भर करती है कि शब्द किस रुप में परिभाषित किया गया है।जैसे-भूर्ण हत्या, गर्भपात, पशु-पक्षी अधिकार पर चर्चा आसान हो सकती है,अगर यह स्पष्ट रुप से परिभाषित हो कि ‘व्यक्ति’ (person) किसे माना जाये।अगर ‘व्यक्ति ‘की परिभाषा में अजन्मे बच्चे ,पशुओं,पौधों को भी शामिल कर दिया जाता है तो स्पष्ट रुप से इनके भी वही अधिकार होंगे जो किसी पूर्ण विकसित मानव के एक व्यक्ति होने की वजह से होते हैं। नीचे साझा किये गये दो पृष्ठों में परिभाषाओं के उद्देश्य व उनके अलग -अलग प्रकार को संक्षिप्त में बताया गया है।

