धर्म दर्शन की रूप-रेखा, लेखक -हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा 

यह पुस्तक धर्म दर्शन से जुड़ी विभिन्न समस्याओं का तुलनात्मक एवं आलोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है।लेखक ने दर्शन शास्त्र विषय के छात्रों को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय में स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर पढ़ाये जाने वाली धर्म-दर्शन से सम्बंधित विषय-वस्तु को एक पुस्तक में समाहित करने की सार्थक कोशिश की है।इस पुस्तक के दो खंड हैं। पहले खंड में 22 अध्याय और दुसरे खंड में 11अध्याय हैं। आप यह पुस्तक नीचे दिये लिंक से डाऊनलोड कर सकते हैं। https://epustakalay.com/book/14899-dharm-darshan-ki-roop-rekha-by-harendra-prasad-sinha

टॉपिक- परिभाषा (Definitions)B.A. (Hons) philosophy, 3rd semester, B.A.(prog.) 6th semester, SEC- Critical Thinking


आपने ऐसे वाक्य कई बार सुने होंगे-
#”मेरे कहने का अर्थ ये नहीं था।”#”आपने मेरी बातों को अन्य अर्थ में लिया।”#”मेरी बात को तरोड़- मरोड़ कर पेश किया।”#”उसने अपनी बात कहने में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया, जिससे सुनने वाला अपने अनुसार अर्थ निकाल सकता है।”#”एक ही शब्द के कई मायने हो सकते है,ये तो इस पर निर्भर करता है कि कहने वाले का उद्देश्य क्या था और उसने किस सन्दर्भ में वह बात कही।”
ये सब वाक्य भाषा के लचीलेपन को दर्शाते हैं। अगर हम अपने विचार तर्कपूर्ण तरीके से रखना चाहते हैं, तो हमें भाषा के लचीलेपन की वजह से उत्पन्न अलग -अलग कारणों और दोषों की जानकारी होना जरुरी है। संयमित और स्पष्ट भाषा ना सिर्फ कही गयी बात को ओर अधिक प्रभावशाली बना देती है, वरन हमारे चिंंतन-मनन की प्रक्रिया को भी सरल और स्पष्ट बना देती है। शब्दों को परिभाषित कर देना एक स्पष्टता प्रदान करता है।
 आलोचनात्मक चिंतन स्पष्टता व निश्चितता के निर्धारण पर ध्यान देते हैं।यह तभी सम्भव है, जब किये गये दावों में सही शब्दों का प्रयोग होगा। यह स्पष्टता इस बात पर निर्भर करती है कि शब्द किस रुप में परिभाषित किया गया है।जैसे-भूर्ण हत्या, गर्भपात, पशु-पक्षी अधिकार  पर चर्चा आसान हो सकती है,अगर यह स्पष्ट रुप से परिभाषित हो कि ‘व्यक्ति’ (person) किसे माना जाये।अगर ‘व्यक्ति ‘की परिभाषा में अजन्मे बच्चे ,पशुओं,पौधों को भी शामिल कर दिया जाता है तो स्पष्ट रुप से इनके भी वही अधिकार होंगे जो किसी पूर्ण विकसित मानव के एक व्यक्ति होने की वजह से होते हैं। नीचे साझा किये गये दो पृष्ठों में परिभाषाओं के उद्देश्य व उनके अलग -अलग प्रकार को संक्षिप्त में बताया गया है।

प्लेटो रचित “द रिपब्लिक” एवं “द अपोलॉजी ऑफ सुकरात”

प्लेटो रचित “द रिपब्लिक” एवं “द अपोलॉजी ऑफ सुकरात” दोनों ही पुस्तक दर्शन शास्त्र  जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।दोनों का हिन्दी अनुवाद अब आप kindle पर  पढ़ सकते हैं और amazon से मंगा भी सकते हैं। दोनों पुस्तकों की विषय -वस्तु के बारे में संक्षिप्त में: 
The Republic “द रिपब्लिक” 

रिपब्लिक प्लेटो द्वारा 380 ई.पू. के आसपास लिखित ग्रन्थ है। यह प्लेटो की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक मानी जाती है।इसमें प्लेटो ने सुकरात की वार्ताएँ वर्णित की हैं। इन वार्ताओं में न्याय, नगर तथा न्यायप्रिय मानव की चर्चा है।प्लेटो ने राजनीति और लोकतंत्र के विषय पर लिखी इस किताब  में राजनीति के कई  अनछुए पहलुओं को बताया। मनुष्य और समाज का परस्पर सबन्ध को भो प्लेटो ने बेहतरीन तरीके से समझाया है। प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में अलग-अलग व्यक्तियों के बीच हुए लम्बे संवादों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि  न्याय क्या है । प्लेटो कहते हैं कि मनुष्य की आत्मा के तीन मुख्य तत्त्व हैं – 1)तृष्णा (Appetite), 2) साहस (Spirit), 3) बुद्धि या ज्ञान (Wisdom)। यदि किसी व्यक्ति की आत्मा में इन सभी तत्वों को समन्वित कर दिया जाए तो वह मनुष्य न्यायी बन जाएगा। ये तीनों गुण कुछ ना कुछ मात्रा में सभी मनुष्यों में पाए जाते हैं, लेकिन प्रत्येक मनुष्य में इन तीनों गुणों में से किसी एक गुण की प्रधानता रहती है। इसलिए राज्य में इन तीन गुणों के आधार पर तीन वर्ग मिलते हैं। पहला: उत्पादक वर्ग – आर्थिक कार्य (तृष्णा), दूसरा: सैनिक वर्ग – रक्षा कार्य (साहस), तीसरा: शासक वर्ग – दार्शनिक कार्य (ज्ञान/बुद्धि)। प्लेटो के अनुसार जब सभी वर्ग अपना कार्य करेंगे तथा दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और अपना कर्तव्य निभाएंगे तब समाज व राज्य में न्याय की स्थापना होगी।

“मानव स्वभाव को तार्किक आधार पर जानने के लिए निश्चित ही प्लेटों की महान रचना” दी रिपब्लिक” एक मनन करने योग्य पुस्तक है। कुछ प्रश्न जो कि हम अपने से हमेशा पूछते रहते हैं उनका जवाब निश्चित ही केवल प्लेटों की कृति दी रिपब्लिक ही दे सकती है।
– क्या अन्याय करना पाप है?

– क्या अन्यायी व्यक्ति शक्ति संपन्न होकर भी खुश है? 

इसका बेहतर और सटीक उत्तर कुछ नहीं हो सकता कि उससे यह प्रश्न तब किया जाए जब वह गुलामों के साथ जंगल में अकेले हो या मृत्यु के करीब हो।
– हमारे राज्य के शासक के कर्तव्य होने चाहिए?  उसके दायित्व क्या हैं और कैसे व्यक्ति को राज्य का शासक होना चाहिए ?

–  क्या होता है जब पात्र शासन करने से बचें या अपात्र शासन करें?
– अल्पतंत्र से गणतंत्र व उससे निरंकुश शासक का उदय कैसे होता है?

–  क्या कमियाँ व कारण होते हैं जो कि गणतंत्र के अस्तित्व को समाप्त कर उसे निरंकुश शासक में हाथों में सौंप देते हैं? 

– हमारे पारिवारिक दायित्व कैसे होने चाहिए?

– कैसे एक परिवार का संचालन होना चाहिए?

– क्या कारण होते हैं जो हमारे बच्चों को माता-पिता व राज्य के प्रति विद्रोही बनाते हैं?

– किसी राष्ट्र और उसके नागरिकों में क्या समानता है?

 – कैसे उस राष्ट्र का चरित्र उसके नागरिकों के चरित्र को प्रदर्शित करता है?

– क्या गलत उपचार करने वाला चिकित्सक, जहाज का उचित नेतृत्व न करने वाला जहाजरान या राष्ट्र पर अनुचित तरीके से शासन करने वाला उसका शासक हो सकता है?

इन प्रश्नों के उत्तर केवल यही पुस्तक हमें दे सकती है।

यह पुस्तक मानव स्वभाव, उसके कर्तव्य व उसका किसी राष्ट्र के चरित्र पर क्या प्रभाव होता है की सर्वोत्तम प्रस्तुति है। “
https://www.amazon.in/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-TRANSLATION-ebook/dp/B07NFD6ZV6

Plato’s Apology “द अपोलॉजी ऑफ सुकरात”
प्लेटो  ने “द अपोलॉजी ऑफ सुकरात” नामक पुस्तक की रचना की थी। इस पुस्तक में प्लेटो ने अपने गुरु सुकरात के बारे में लिखा। इसमें उनके गुरु के विचार और दर्शन शामिल है। 

“अपोलॉजी” सुक़रात कि न्यायालय में की गई उस बहस की प्रस्तुति है, जिसमें उन्होंने अपने पक्ष को रखा, जब उन पर यह आरोप लगाया गया था की वे राज्य के युवाओं को भ्रष्ट कर रहें है और वे ईश्वर पर विश्वास नहीं करते अपितु किसी और में विश्वास करते हैं।अपोलॉजी  से यहाँ मतलब माफिनामे से नहीं है वरन सुकरात का अपने किये गये कार्य का बचाव और पक्ष का प्रस्तुतिकरण है।अपोलॉजी का प्रारम्भिक अर्थ है कारण से बचाव या किसी का अपने कृत्यों या मत में विश्वास। यह प्लेटों द्वार विस्तार से लिपिबद्ध की गई रचना है जो काफी हद तक वास्तव में किए गए बेहतरीन संवादों (बहस) में से एक है।”
https://www.amazon.in/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%85%E0%A4%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B2%E0%A4%81%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-Translation-ebook/dp/B07ND8F96W/ref=pd_aw_sbs_351_4/259-2421873-1992329?_encoding=UTF8&pd_rd_i=B07ND8F96W&pd_rd_r=d8ce6f1f-b30b-413f-932f-f3429b3aa495&pd_rd_w=G38Vf&pd_rd_wg=fjfv1&pf_rd_p=695cf2c3-c92f-40a6-82c6-fff7783abc65&pf_rd_r=943W35X1E5G82T74FNP9&psc=1&refRID=943W35X1E5G82T74FNP9

Cognitive Biases ( संज्ञात्मक पूर्वाग्रह)

B.A.(H) Philosophy, 3rd semester, B.A(P) phil Discipline,  6th semester SEC- Critical Thinking, Delhi University

Topic : Cognitive Biases ( संज्ञात्मक पूर्वाग्रह)

स्थिति 1

अगर हमें  या हमारे समूह के किसी व्यक्ति को सफ़लता मिलती है,तो हम इसे कठिन परिश्रम का परिणाम मानते हैं ।वहीं अगर किसी दूसरे व्यक्ति या अन्य समूह से सम्बंधित व्यक्ति को सफ़लता मिलती है तो हम इसे मेहनत का नाम ना देकर उनके सौभाग्य का परिणाम मानते हैं ।वहीं अपनी असफलता का दोष भाग्य पर डाल देते है और दूसरे की असफलता का कारण उसके आलस और परिश्रम ना करना मानते हैं।

स्थिति 2

आप कहीं खड़े हैं, तभी एक व्यक्ति वहाँ आता है और ऊँची आवाज में सभी व्यक्तियों को जमीन पर लेट जाने के लिये कहता है।वह यही बात जोर-जोर से कई बार दोहराता है।अधिकतर लोग और शायद आप भी उसकी बात मानकर जमीन पर लेट जायेंगें ।

स्थिति 3

आपकी कक्षा में कोई प्रश्न पुछा गया। आपका उत्तर À है और कक्षा के अन्य सभी छात्रों का उत्तर B है।आपका मन हो ना हो संदेह की स्थिति में जरूर आ जायेगा कि आपका उत्तर गलत है।   यह भी हो सकता है कि आप उसी विकल्प का चुनाव कर लें जो बाकियों ने चुना है, क्योंकि odd one out कि स्थिति में कौन पड़ना चाहता है!


क्या आपको तीनों स्थितियों में व्यक्ति का निर्णय पूरी तरह उसके नियन्त्रण में नज़र आता है? या आप मानेंगे की हमारा मस्तिष्क एक विशेष प्रकार से काम करने को बाधित नज़र आता है?


धारणाओं को बनाने में जितना तथ्यों का हाथ होता है उतना ही व्यक्ति की मनोस्थिति व संवेदनाओं का भी रहता है।मनुष्य का मस्तिष्क प्रति सेकंड 160क्रियाओं को पूरा कर सकता है,जो इसे किसी भी कम्प्युटर या मशीन से बेहतर बनाता है।लेकिन इस मस्तिष्क में कई कमियां हैं।इन्हीं में से एक है -संज्ञात्मक पूर्वाग्रह या अंग्रेजी में जिसे कहते हैं cognitive bias। ये एक तरह का दिमागी पक्षपात है ,जो हमें चेतना और सूझ- बूझ  से परे कर देता है और हम सिर्फ अपनी धारणाओं के आधार पर फ़ैसला लेते हैं। शेयर किये गये तीन पेजों में ऐसे 11संज्ञात्मक पूर्वाग्रहों को इंगित किया गया है।

Existentialism Is Humanism (अस्तित्ववाद मानववाद है) -ज्यां पाल सार्त्र

दिल्ली विश्वविद्यालय के B.A. (Hons) 2nd Yr, में एक पेपर Text of Western Philosophy’ निर्धारित है।जिसके स्लेबस का पहला टॉपिक सार्त्र की यह पुस्तक है।
1946 में सार्त्र ने एक भाषण दिया जो एक किताब Existentialism Is Humanism (अस्तित्ववाद मानववाद है) के रुप में सामने आया ।  इसमें उन्होंने इस बात को सामने रखा कि अस्तित्त्ववाद मानवता विरोधी नहीं है ।
*ज्यां  पाल सार्त्र की धारणा ‘अस्तित्व सार का पूर्ववर्ती है‘ अस्तित्ववादी दर्शन की व्याख्या करने वाली आधारभूत धारणा है। सार्त्र अपने प्रसिद्ध व्याख्यान ‘अस्तित्ववाद मानववाद है’ (1946) में कहते हैं कि प्लेटो एवं अरस्तू से लेकर हीगेल तक मुख्यधारा के दार्शनिक मानते रहे हैं कि सृष्टि के भीतर मौजूद परम ज्ञान, जिसे वे ‘आयडिया’ कहते हैं, सृष्टि की रचना का मूल कारण है। यानी सृष्टि का अस्तित्व बाद में आता है, पहले सृष्टिकर्ता के भीतर उसका तत्वज्ञान रहता है। ये दार्शनिक तत्वज्ञान या परमअर्थ को पहले और अस्तित्व को बाद में प्रकट होने वाली वस्तु मानते हैं, जबकि अस्तित्ववादी इस ज्ञान क्रम को उलट देते हैं। वे कहते हैं कि जगत का अस्तित्व, मनुष्य के संदर्भ में पहला है; फिर इस अस्तित्व का ज्ञान हमारी चेतना का रूप लेता है। यानी हम ‘होते’ पहले हैं, फिर ‘अपने’ होने के असल अर्थ को पाते हैं। 
यहां ‘होने’ के अर्थ को समझना जरूरी है। ‘होना’ दो तरह का होता है — एक ‘अस्तित्व में होना’ है। दूसरा, ‘होते हुए होना’ है।
एक हम उसी तरह होते हैं, जैसे शेष सारे पदार्थ हैं और एक हम अपने होने के ‘बोध’ के साथ इस ‘होने के अर्थ’ को खोजते और पाते हुए होते हैं। अस्तित्ववाद में मनुष्य यही सफर तय करता है। *(http://hindisahityakosh-bbp.blogspot.com/2015/01/normal-0-false-false-false-en-in-x-none_37.html?m=1)
आप सार्त्र की पुस्तक का हिन्दी अनुवाद amazon या Flipkart से आर्डर कर सकते हैं। लिंक नीचे दिये हैं :
https://www.amazon.in/Astitvavad-Aur-Manavvad-Jyan-Saart/dp/B0752LF88L


https://www.flipkart.com/astitvavad-aur-manavvad/p/itmffmczu5jzdswb

प्रभा खेतान की “स्त्री उपेक्षिता” , द सेकेंड सेक्स किताब का हिंदी रूपांतरण

” स्त्री पैदा नहीं होती वरन बना दी जाती है”
बी.ए. (Hons.) प्रथम वर्ष, GE- Ethics in Public Domain कोर्स में एक टॉपिक लेखिका सिमोन द बउआर(
 Simone De Beauvoir)   द्वारा  लिखित “द सेकेंड सेक्स”  वॉल्यूम 2 का 5वाँ पाठ ” The Married Woman” है। प्रभा खेतान की “स्त्री उपेक्षिता” ,  द सेकेंड सेक्स किताब का हिंदी रूपांतरण है। छात्र इस पुस्तक को ना सिर्फ अपने कोर्से सम्बंद्धी पाठ पढ़ने के लिये उपयोग कर सकते हैं, वरन नारीवाद को समझने के लिये एक बेहतरीन पुस्तक है। 

 पुस्तक और अनुवादिका के बारे में संक्षिप्त जानकारी https://hi.unionpedia.orgसे

सेकेंड सेक्स (The Second Sex) सिमोन द बउआर द्वारा फ्रेंच में लिखी गई पुस्तक है जिसने स्त्री संबंधी धारणाओं और विमर्शों को गहरे तौर पर प्रभावित किया है। स्त्री अधिकारवादी विचारधारा वाली सिमोन की यह पुस्तक नारी अस्तित्ववाद को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करती है। यह स्थापित करती है कि स्त्री जन्म नहीं लेती है बल्कि जीवन में बढ़ने के साथ बनाई जाती है। उनकी यह व्याख्या हीगेल के सोच को ध्यान में रखकर “दूसरा” (the Other) की संकल्पना प्रदान करती है। उनकी इस संकल्पना के अनुसार, नारी को उसके जीवन में उसकी पसंद-नापसंद के अनुसार रहना और काम करने का हक़ होना चाहिए और वो पुरुष से समाज में आगे बढ़ सकती है। ऐसा करके वो स्थिरता से आगे बढ़कर श्रेष्ठता की ओर अपना जीवन आगे बढ़ा सकतीं हैं। ऐसा करने से नारी को उनके जीवन में कर्त्तव्य के चक्रव्यूह से निकल कर स्वतंत्र जीवन की ओर कदम बढ़ाने का हौसला मिलता हैं। दूसरा लिंग एक ईएसआई पुस्तक है, जो यूरोप के सामाजिक, राजनैतिक, व धार्मिक नियमो को चुनौती देती हैं, जिसने नारी अस्तित्व एवं नारी प्रगति में हमेशा से बाधा डाली है और नारी जाती को पुरुषो से नीचे स्थान दिया हैं। अपनी इस पुस्तक में में बेऔवौर पुरुषों के ढकोसलों से नारी जाती को लाद कर उनके जीवन में आयी बढायो पर सोच न करने की नीति के विषय में अपने विचार प्रदान किये हैं। 

प्रभा खेतान

डॉ प्रभा खेतान डॉ॰ प्रभा खेतान (१ नवंबर १९४२ – २० सितंबर २००८) प्रभा खेतान फाउन्डेशन की संस्थापक अध्यक्षा, नारी विषयक कार्यों में सक्रिय रूप से भागीदार, फिगरेट नामक महिला स्वास्थ्य केन्द्र की स्थापक, १९६६ से १९७६ तक चमड़े तथा सिले-सिलाए वस्त्रों की निर्यातक, अपनी कंपनी ‘न्यू होराईजन लिमिटेड’ की प्रबंध निदेशिका, हिन्दी भाषा की लब्ध प्रतिष्ठित उपन्यासकार, कवयित्री तथा नारीवादी चिंतक तथा समाज सेविका थीं। उन्हें कलकत्ता चैंबर ऑफ कॉमर्स की एकमात्र महिला अध्यक्ष होने का गौरव प्राप्त था। वे केन्द्रीय हिन्दी संस्थान की सदस्या थीं।

Information link: https://hi.unionpedia.org/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE

भाषा दर्शन और लुडविग विटगेंस्‍टाईन

पाश्चात्य भाषा दर्शन को समझना हो तो लुडविग विटगेंस्‍टाईन की कृतियों  ट्रैक्‍टेटस लॉजिको फिलोसफिकस, फिलोसोफीकल इनवेस्टीगेटन, ऑन सेर्टेनिटी को समझ लेना अनिवार्य हो जाता है।भारतीय मूल के हिन्दी भाषी छात्रों के लिये अगर पुस्तकों का हिन्दी रूपांतरण उपलब्ध ना हो तो उन्हें या तो सेकेंडरी सोर्स पर ही निर्भर रहना पड़ता है,या फिर अंग्रेजी में पढ़ना पड़ता है। जिसमें एक अधुरी सी समझ ही बनती है। 
प्रो• अशोक वोहरा की मेहनत और अथक प्रयास का ही परिणाम है कि उन्होनें विटगेंस्‍टाइन की चार कृतियों( ऊपर लिखी तीन के अलावा Culture and Value) का हिन्दी अनुवाद कर प्रकाशित करा दर्शन के क्षेत्र में एक विशेष योगदान दिया है।इनमें से तीन पुस्तकें ICPR से प्रकाशित हुई हैं और ‘ट्रैक्‍टेटस’ भारतीय ज्ञानपीठ से। मेरा सौभाग्य रहा कि  मुझे इनमें से तीन किताबें प्रो• वोहरा से पढ़ने का मौका मिला।
 नीचे इन पुस्तकों को ऑनलाइन ऑर्डर कर मंगाने के लिये लिंक दिये हैं। ये पुस्तकें दिल्ली विश्वविद्यालय की सेन्ट्रल लाइब्रेरी में भी उपलब्ध हैं।
1• Philosophical Investigations (1996)
https://www.exoticindiaart.com/m/book/details/philosophical-investigations-old-book-NZU138/
2• On Certainty (1998)
https://www.amazon.com/On-Certainty/dp/8185636397
3• Culture and Value (1998) – 
https://www.amazon.com/Ludwig-Wittgenstein-Culture-Value/dp/8185636389the three are published by ICPR; and 

4• Tractatus Logico Philosophicus (2016, Bhartiya Jananpitha).
https://www.amazon.in/LUDWIG-WITTGENSTEIN-LOGICO-PHILOSOPHICUS-Ashok-Vohra/dp/9326354784/ref=mp_s_a_1_9?qid=1580732028&refinements=p_27%3AAshok+Vohra&s=books&sr=1-9Presently showing out of stock.

Patanjali Philosophy (दर्शनशास्त्र) Notes in Hindi (IAS PCS UPPCS)

पतांजलि इंस्टिट्यूट द्वारा तैयार दर्शन शास्त्र के हिन्दी में नोटस।

202पेज में पाश्चात्य दर्शन के मुख्य दार्शनिक विचारों काआसान भाषा में व्याख्यान। पुस्तक में निम्नलिखित दार्शनिकों के विचारों को प्रस्तुत किया गया है।

1• देकार्त,स्पिनोज़ा,लाइबनिज़

2• मूर,रसेल, विटगेंसटाइन

3• लॉक, बर्कले, ह्यूम

4• काण्ट

5• कीकेर्गार्ड, सार्त्र, हाईडेगर

6• प्लटो,अरस्तू

7• स्ट्रासन, क्वाइन

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